तंत्र की सर्जरी जरूरी , तय हो बच्चों की मौत की जबावदेही (दैनिक ट्रिब्यून)

Shared by Sachin Shukla

विकास के थोथे दावों के बीच आपराधिक लापरवाही के चलते यदि पांच दिन में साठ बच्चों की मौत हो जाये तो यह शर्मसार करने वाला है। यह जानते हुए भी कि बरसात के मौसम में इंसेफेलाइटिस यानी जापानी बुखार से गोरखपुर क्षेत्र में साल-दर-साल मौतें होती हैं, ये जानलेवा लापरवाही क्यों? जैसा कि बताया जा रहा था कि मौतें आक्सीजन की कमी से हुईं तो यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। गैस आपूर्ति करने वाली कंपनी का 68 लाख बिल बकाया होना, जबकि दस लाख तक बकाया होने की शर्त थी, इस मामले में जानबूझकर की गई लापरवाही नजर आती है। दरअसल इस हादसे ने चिकित्सा तंत्र में व्याप्त सड़ांध को उजागर कर दिया है। योगी सरकार को बने पर्याप्त समय हो चुका है, ऐसे में जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेना असंगत है। उस पर जिम्मेदार लोगों की तरफ से बयान आना कि अगस्त के महीने में तो बच्चे मरते ही हैं, संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह कि जिस क्षेत्र में पिछले चार दशक में दस हजार अबोध बच्चे असमय काल-कलवित हो चुके हों, उस बीमारी को लेकर ऐसी लापरवाही?

गोरखपुर के जिस बीआरडी मेडिकल कालेज में ये मौतें हुई हैं वैसी चिकित्सा सुविधा सैकड़ों किलोमीटर दूर-दूर तक नहीं है। इस अस्पताल में जापानी बुखार के उपचार के लिये विशेष वार्ड बनाया गया है। घटना के कुछ समय पहले मुख्यमंत्री स्वयं इस अस्पताल में गये थे। इसके बावजूद हादसे का होना चिकित्सा तंत्र की लापरवाही को ही उजागर करता है। दरअसल इस घटना ने सारी चिकित्सा व्यवस्था की पोल खोल दी है। घटना से सबक लेकर सारी व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करने की जरूरत है। छोटी मछलियों को सजा देने से व्यवस्था नहीं बदलेगी। उन आरोपों की जांच होनी चाहिए कि कमीशन के चलते लखनऊ से गैस आपूर्ति करने वाली कंपनी को बकाया न देने के निर्देश थे। कालेज के प्रिसिंपल के निलंबन और कड़ा दंड देने की घोषणा से बात नहीं बनेगी। शासन स्तर पर व्याप्त काहिली को भी दूर करने की जरूरत है। अब वक्त आ गया है कि लीपापोती की कवायदों को बंद करके पूरे चिकित्सा तंत्र को दुरुस्त किया जाये। जबावदेही केवल चिकित्सा तंत्र से जुड़े अधिकारियों व कर्मचारियों की नहीं, शासन स्तर पर भी तय की जानी चाहिए।

 

 

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