व्यवस्था को ‘ऑक्सीजन’ (बिजनेस स्टैंडर्ड)

Shared by user Sachin Shukla

गोरखपुर के अस्पताल में बच्चों की मौत ऑक्सीजन की कमी या किसी अन्य कारण से होने पर हो रही चर्चा काफी हद तक इस बिंदु पर केंद्रित है कि अपने दायित्वों का निर्वहन करने में नाकाम रहे लोगों की व्यक्तिगत आपराधिक जवाबदेही बनती है। वैसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो हमारी चर्चा का केंद्र यह बिंदु नहीं होना चाहिए। अगर यह दावा किया जा रहा है कि बच्चों की मौत ऑक्सीजन की कमी के चलते नहीं हुई तो भी ऑक्सीजन आपूर्ति बनाए रखने में हुआ गंभीर कुप्रबंधन बचाव के काबिल नहीं है और यह एक आपराधिक लापरवाही भी है क्योंकि इससे बच्चों की मौत हो सकती थी। ऑक्सीजन की कमी या किसी अन्य कारण से बच्चों की मौत होने के सवाल पर ही चर्चा केंद्रित होने से हमारा ध्यान कहीं अधिक व्यापक और व्यवस्था के लिहाज से कहीं अधिक अहम सवालों से भटक सकता है। सवाल हैं कि अस्पताल का किस तरह प्रबंधन (या कुप्रबंधन) हो रहा था, अस्पताल में कई तरह के रैकेट उभरते हुए दिख रहे थे (लगता है कि ऑक्सीजन सिलिंडर की चोरी करने वाला रैकेट भी एक था), बिलों का भुगतान करने के लिए कमीशन मांगे जानेे की आशंका दिख रही है, चिकित्सा शिक्षा के लिए आवंटन में तीव्र कटौती करने से खराब बजटीय प्राथमिकता भी झलकती है और अस्पताल में साफ-सफाई और स्वच्छता का अभाव भी है।

सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों की खराब स्थिति ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में मस्तिष्क ज्वर एन्सेफलाइटस को जड़ें जमाने का मौका दिया है। ये सभी सवाल कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। असल में ये सवाल ऑक्सीजन की कमी के चलते हुई मौतों की ही तरह तत्काल तवज्जो चाहते हैं। हालांकि इन सवालों के जवाब तलाश पाना कहीं मुश्किल है क्योंकि किसी एक डॉक्टर और एक गैस आपूर्तिकर्ता पर दोषारोपण कर आप बच नहीं सकते हैं। ऑक्सीजन की कमी के चलते बच्चों की मौत होने के आरोपों पर सरकार का तर्क यह है कि ऑक्सीजन मौजूद होने पर भी तो बच्चे मरते रहे हैं। लेकिन किसी भी सरकार के लिए यह बचाव कैसे हो सकता है कि एन्सेफलाइटस की वजह से हर साल ही सैकड़ों लोग मरते रहते हैं? अगर यह मामला किसी सरकार विशेष से जुड़ा न होकर क्षेत्र विशेष से जुड़ा है तो फिर अखिलेश यादव और उनके पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री तो मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कहीं अधिक जिम्मेदार हैं क्योंकि नई सरकार तो चार महीनों से ही वजूद में है। लेकिन इस समस्या का समाधान मौजूदा मुख्यमंत्री को ही निकालना होगा और अगर ध्यान एन्सेफलाइटस से हो रही मौतों पर ही केंद्रित रहा तो ये समाधान जल्दी लागू हो सकेंगे। गोरखपुर में त्रासदपूर्ण स्थिति केवल ऑक्सीजन आपूर्ति बहाल हो जाने से ही नहीं खत्म हो जाएगी।

इस समस्या के केंद्र में वह धारणा है जो इस बीमारी से होने वाली मौतों को सामान्य मान लेती है लेकिन इस राय को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। आजादी के 70 साल बाद भी खासकर बीमारू कहे जाने वाले राज्यों में असली त्रासदी यह है कि गोरखपुर के इस अस्पताल की घटना अपने-आप में अकेला उदाहरण नहीं है। यह घटना सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों में जारी लापरवाही और कुप्रबंधन का एक प्रतीकात्मक उदाहरण है। यह काफी दुखद है कि प्रधानमंत्री ने अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में गोरखपुर त्रासदी से जुड़े इस व्यापक प्रश्न पर तवज्जो देने का मौका गंवा दिया। मानव विकास संबंधी आंकड़ों में भारत के निराशाजनक प्रदर्शन के पीछे इसके शिक्षा एवं स्वास्थ्य क्षेत्रों की खराब स्थिति दो मूल कारक रही है। यहां तक कि बांग्लादेश से भी खराब हालत है। समाज में असमानता फैलने की जड़ में ये अहम कारक होते हैं। शिक्षा का खराब स्तर एक गरीब व्यक्ति के लिए विकास के रास्ते को रोक देता है और स्वास्थ्य सुविधाओं का खराब स्तर एक परिवार को गरीबी रेखा के नीचे ही रहने के लिए मजबूर कर देता है। मोदी ने अपने कार्यकाल में दर्जनों योजनाओं का ऐलान किया है। वह गोरखपुर त्रासदी से देश भर को लगे सदमे का उपयोग राष्ट्रीय स्तर पर जनमत बनाने और प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर पर गुणवत्तापरक शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के दो अभियान शुरू करने के लिए कर सकते थे। इन अभियानों के लिए आवंटन बढ़ाने के अलावा उनकी प्रगति की नियमित निगरानी की व्यवस्था भी की जा सकती थी। लेकिन उन्होंने दुखद तरीके से केवल गोरखपुर त्रासदी का सरसरी तौर पर जिक्र किया और दूसरे मुद्दों का रुख कर लिया। किसी संकट की तरह किसी शर्मनाक घटना का भी इस्तेमाल व्यवस्थागत खामियों को दूर करने के लिए किया जा सकता है। लेकिन दुखद है कि इस बार यह मौका गंवा दिया गया।

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